8 फ़रवरी 2013 - 20:30

सारे मुसलमान एक ख़ुदा को मानते हैं और एक ही ख़ुदा पर ईमान रखते हैं इसलिये मुसलमानों की सुसाइटी में जितने भी इन्सान हैं चाहे वह गोरे हों या काले, पूरबी हों या पश्चिमी, एक ज़ात के हों या अलग अलग ज़ातों के, उनका कल्चर एक हो या अलग अलग, वह सब एक हैं

1. अल्लाहसारे मुसलमान एक ख़ुदा को मानते हैं और एक ही ख़ुदा पर ईमान रखते हैं इसलिये मुसलमानों की सुसाइटी में जितने भी इन्सान हैं चाहे वह गोरे हों या काले, पूरबी हों या पश्चिमी, एक ज़ात के हों या अलग अलग ज़ातों के, उनका कल्चर एक हो या अलग अलग, वह सब एक हैंक्योंकि एक ख़ुदा को मानते हैं, एक ही सेंटर से जुड़े हैं और सब उसी की इबादत करते हैं और उसी से मदद मांगते हैं बल्कि तौहीद का अस्ल मतलब यह है कि केवल इन्सान ही नहीं बल्कि दुनिया की सारी चीज़ें एक दूसरे से जुड़ी हैं क्योंकि सब एक ख़ुदा की तसबीह करती हैं और उन सब का पैदा करने वाला एक है।2. इस्लामी पहचानआज पूरी दुनिया में मुसलमान अपनी खोई हुई पहचान की तरफ़ दोबारा लौट रहे हैं, इस्लामी देश हों या वह देश जहां मुसलमान रहते हैं हर जगह मुसलमानों को यह महसूस होने लगा है कि हमारी भलाई इसी में है कि हम इस्लाम की तरफ़ वापस आएं। कई वर्षों तक मुसलमान यूरोपी और वेस्टर्न कल्चर को सब कुछ समझते थे और उसी में अपने लिये बचाव का रास्ता ढ़ूँढ़ते थे लेकिन जब उन्हें वेस्टर्न कल्चर का खोखला पन नज़र आ गया तो उन्होंनें फिर से इस्लाम की तरफ़ मुँह मोड़ लिया है ख़ास तौर से जवानों की नज़र में इस्लाम ही उनकी असली पहचान है। दुश्मन भी इसी चीज़ से डरता है कि मुसलमानों को उनकी पहचान और असलियत समझ में आ जाए क्योंकि यह चीज़ मुसलमानों में एकता का कारण है। 3. क़ुरआन मजीदसारे मुलमान एक क़ुरआन पर ईमान रखते हैं और उसी को अल्लाह की किताब मानते हैं (अलबत्ता कुछ नादान दोस्त या समझदार दुश्मन यह कहते हैं कि शियों के यहाँ कोई दूसरा क़ुरआन है, जो कि बिल्कुल ग़लत है। यह दुश्मन का प्रोपगंडा है। शिया भी उसी क़ुरआन को मानते हैं जिसे दूसरे मुसलमान मानते हैं और उनके यहाँ भी वही क़ुरआन है जो सभी मुसलमानों के यहाँ है।) क़ुरआने मजीद नें सारे मुसलमानों को एकता की तरफ़ बुलाया है। क़ुरआन नें मुसलमानों को सावधान किया है कि अगर वह इकट्ठा रहे तो वह हमेशा आगे, उन्नतशील और प्रभावशाली रहेंगे लेकिन अगर उनमें एकता न रही तो उनकी पहचान ख़त्म हो जाएगी और उनका सब कुछ मिट्टी में मिल जाएगा।क़ुरआने मजीद में ’’یَااَیُّھاَ الَّذینَ آمَنُوا ‘‘यानी ऐ ईमान वालों! आया है, कहीं भी’’یَااَیُّھاَ الَّذینَ تَشَیَّعُوا ‘‘ ऐ शियों! या یا ’’یَااَیُّھاَ الَّذینَ تَسَنَّنُوا‘‘ऐ सुन्नियों! नहीं आया है। यहाँ ईमान वालों से बात की जा रही है, किस चीज़ पर ईमान रकने वाले? एक ख़ुदा, एक पैग़म्बर और एक क़ुरआन पर ईमान रखने वाले। क़ुरआन फ़रमाता है’’وَاعتَصِمُوا بِحَبلِ اللہِ جَمِیعاً وَلَا تَفَرَّقُوا‘‘ (سورہ آل عمران/ ۱۰۳)अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रखो और एक दूसरे से अलग न हो जाओ। यहाँ सभी मुसलमानों को हुक्म दिया जा रहा है, किसी एक समुदाय से नहीं कहा जा रहा है। इस आयत में एक ख़ास बात यह भी है कि यहाँ अल्लाह की रस्सी को पकड़ने का हुक्म सब को एक साथ दिया गया है यानी ऐसा अलग अलग हो कर नहीं करना बल्कि सब एक साथ पकड़ो। मुसलमानों से अलग होकर नहीं, सारे मुसलमानों को साथ रख कर यह काम करने का हुक्म है।.............166